RBM और अवैध रेत खनन के नाम पर गंगा का चीरहरण, जबाब देय कौन ?
RBM और अवैध रेत खनन के नाम पर गंगा का चीरहरण, जबाब देय कौन ?
खनन पर क्या बोले पर्यावरण वैज्ञानिक सुनिए
उत्तरकाशी (वीरेंद्र सिंह नेगी)- गंगा (भागीरथी )नदी के मध्य रिवर बेड मेटीरियल (RBM ) का नाम दे कर खनन माफिया खुल्लेआम गंगा नदी से रेता,बजरी व् बड़े बड़े पत्थरो को ठिकाने लगाए जा रहे है. NGT के नियमों के विरुद्ध गंगा नदी को दूषित व् गंगा नदी में रहने वाले जीवों को भी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। खास तौर में चिन्याली सोड़ में रेता माफिया खुले आम ये सारे कार्य करते दिख रहे है. जिसमे कोई सुध लेने को तैयार नहीं है. चिन्याली सोड़ के मुख्य बजार से नगुण व् उससे आगे तक गंगा नदी के किनारे रेता का खनन खुल्ले आम देखने को मिल रहा है।
डुंडा से चिन्यालीसौड़ ब्लाक तक भागीरथी( गंगा) नदी के किनारे अवैध रूप से खनन किया जा रहा है. जिसमे गंगा नदी दूषित होती दिख रही है । सार्वजनिक तौर पर खुले आम मनको को ताक पर रख कर खनन बड़ी मात्रा में किया जा रहा है.वहीं प्रशासन भी बड़ी खमोशी से बैठा है।
शम्भु प्रसाद नौटियाल, पर्यावरण वैज्ञानिक
पर्यावरण वैज्ञानिक शम्भु प्रसाद ने बताया कि जिस प्रकार नदियों में खनन हो रहा है उसका आने वाले नतीजे मनुष्य जाति के लिए खतरनाक साबित होगा. पर्यावरण वैज्ञानिक ने कहा- नदी में जीवन को बनाए रखने की क्षमता, नदी के तल की सामग्री द्वारा प्रदान किए गए विविध आवासों के साथ-साथ उसके जल में मौजूद घुलित ऑक्सीजन (डीओ) की मात्रा पर भी निर्भर करती है। बहुत से लोग इस तथ्य को नहीं समझते और सराहते हैं कि मोटे तल की सामग्री की उपस्थिति ही नदी के पानी को मथने को सुनिश्चित करती है, जिससे इसकी घुलित ऑक्सीजन की स्थिति में वृद्धि होती है और सीमा (सूक्ष्म जीव और वनस्पति, मछलियाँ, अकशेरुकी और कशेरुकी) के साथ-साथ आबादी के आकार के संदर्भ में इसकी जैविक समृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
याद करें कि बचपन में जब आप जानबूझकर या गलती से नदी के तल में रखे पत्थर को पलट देते थे, तो मकड़ी, बिच्छू या केकडे अपना बचाव करते थे ?इस प्रकार जो पहली नज़र में कई लोगों को हानिरहित लग सकता है, वह है जीवनहीन पत्थरों, बजरी और रेत को हटाना, वास्तव में नदी से उसके महत्वपूर्ण और आवश्यक तत्वों को छीनना। उनकी अनुपस्थिति न केवल जैविक रूप से मृत नदियों का परिणाम है.गहरी और मशीनीकृत खनन के माध्यम से सतही जल को जलभृतों से जोड़ने वाले संपर्क को काटकर भूजल पुनर्भरण क्षमता को काफी हद तक कम कर देता है, बल्कि उनमें बाढ़ को पहले से कहीं अधिक भयंकर, अनियंत्रित और विनाशकारी बना देता है, जो नदी तल खनन से प्राप्त होने वाले राजस्व से होने वाले लाभ को भी खत्म कर देता है।
उत्तराखंड जैसा राज्य अपनी नदियों में खनन करने की योजना बना रहा है, जो ढलान के हिसाब से अपनी खड़ी पर्वतीय घाटियों, छिद्रयुक्त भाबर पथों और धीरे-धीरे चौड़ी होती बाढ़ के मैदानों के बीच संतुलित हैं, और इसके परिणामस्वरूप 1970, 2012 और 2013 में हुई हाल की तबाही की तरह और अधिक संकट को आमंत्रित कर सकता है.सावधान हो जाइये।
