उत्तरकाशी: वीरपुर क्षेत्र में मनाया जा रहा बुद्ध नव वर्ष (लोसर)
उत्तरकाशी: वीरपुर क्षेत्र में मनाया जा रहा बुद्ध नव वर्ष (लोसर)
उत्तरकाशी
भागीरथी के तट पर स्थित किन्नौरी, जाड़ भोटिया व् खाम्पा समुदाय की मौजूदगी एक विशिष्ट संस्कृति का एहसास कराती है। खासतौर पर समुदाय के पारंपरिक लोसर पर्व पर उमंग और उल्लास का माहौल चरम पर रहता है। संस्कृति और परंपराओं के प्रतीक इस लोक पर्व पर होली, दशहरा और दीपावली एक साथ मनाते हुए बौद्ध पचांग के अनुसार नव वर्ष का स्वागत किया जाता है। कुछ ऐसा ही पर्व वीरपुर डुंडा व बगोरी में देखने को मिलता है। जहां किन्नौरी,जाड़ भोटिया व् खाम्पा समुदाय के लोगों ने लोसर का पहल दिन दीपावली के रूप में मनाया।
Vol. लोसर तिब्बती-बौद्ध परंपरा का नव वर्ष होता है। यह पर्व शांति, करुणा, प्रेम और नए आरम्भ का संदेश देता है।उत्तरकाशी जिले के वीरपुर क्षेत्र में यह पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
इस दिन लोग सुबह-सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनते हैं, घरों की सफाई करते हैं और भगवान बुद्ध व् अपने इष्ट देवता की पूजा करते हैं। मठों और घरों में प्रार्थनाएँ की जाती हैं। लोग एक-दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएँ देते हैं।
लोसर के अवसर पर पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं, विशेष भोजन बनाया जाता है और झंडियाँ (प्रेयर फ्लैग) लगाई जाती हैं। यह पर्व सिखाता है कि हमें अपने जीवन में अच्छाई अपनानी चाहिए और सभी के साथ प्रेम व भाईचारे से रहना चाहिए।
बौद्ध पंचांग के अनुसार किन्नौरी, जाड़ भोटिया समुदाय के लोगों ने अपने -अपने घरों में पहले छिलके जलाते हैं । इसके बाद सभी लोग छिलके लेकर मशाल के रूप में डुंडा बाजार से होते हुए गंगोत्री हाईवे पर स्थित एक चौराह पर एकत्रित होते हैं । जहां पर सभी ने छिलके विसर्जित किए और दुख रोग एवं अशांति को नष्ट करने की कामना करते है।भूत पूर्व प्रधान भवान सिंह व् सोनू नेगी ने बताया कि बौद्ध पंचाग के अनुसार पारंपरिक लोसर पर्व का आगाज हो चुका है। पहले दिन दीपावली मनाई गई। वहीं यह पर्व एक -दूसरे को हरियाली वितरित कर नूतन वर्ष की शुभकामनाएं दी जाती हैं . तीसरे दिन आटे कि होली भी खेली जाती है.जिसमे तीसरे दिन पंचशील झंडा लगाया जाता हैं ।
