गोमुख में पिघलते ग्लेशियर और गंगोत्री धाम सिमटते घाट, बीच गंगा में फैला RBM
गोमुख में पिघलते ग्लेशियर और गंगोत्री धाम सिमटते घाट, बीच गंगा में फैला RBM
पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की चुनौती, जिम्मेदार कौन?
उत्तरकाशी(वीरेंद्र सिंह नेगी) – हिमालय की चोटियों मे बसा गोमुख देवभूमि उत्तराखंड के आंचल में बसा गंगोत्री धाम.कहा जाता है कि मां गंगा स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं, लेकिन आज यही पावन धाम प्रकृति के रौद्र रूप और जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार झेल रहा है।

हर साल मानसून और गर्मी के मौसम में गंगोत्री मंदिर से आगे गंगा का जलस्तर डराने वाली सीमा तक बढ़ जाता है.भागीरथी की लहरें इतनी शक्तिशाली होती हैं कि वे सदियों पुराने स्नान घाटों को अपनी चपेट में ले रही हैं. पत्थरों का कटना और किनारों का धंसना अब यहाँ की हर साल की कहानी बन गई है।
गंगोत्री एक इको-सेंसिटिव जोन (Eco-Sensitive Zone) है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण गौमुख ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. जब ऊपर पहाड़ों पर भारी बारिश होती है या बादल फटते हैं.तो नदी का वेग और जलस्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है जिससे निचली बस्तियों और घाटों को भारी नुकसान पहुँचता है।

कई वर्ष पहले गंगा का बहाव ऐसा नहीं था. अब हर साल घाटों को नुकसान होता है.संबंधित विभाग जहां गंगोत्री धाम के घाटों की सुरक्षा मे सुरक्षा दीवार लगा रहा है क्या घाट और मंदिर की सुरक्षा दीवारें इस वेग को झेल पाएगी या नहीं? सरकार को यहाँ पर ठोस सुरक्षा कार्यों की जरूरत है.चुनौती केवल निर्माण की नहीं है, बल्कि संतुलन की है. क्योंकि यह एक इको-सेंसिटिव जोन है.यहाँ कंक्रीट का भारी निर्माण भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है। जरूरत है ‘बायो-इंजीनियरिंग’ और प्रकृति के अनुकूल सुरक्षा घेरों की.ताकि आस्था के इन केंद्रों को बचाया जा सके।
गंगोत्री एक इको-सेंसिटिव जोन (Eco-Sensitive Zone) है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण गौमुख ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. जब ऊपर पहाड़ों पर भारी बारिश होती है या बादल फटते हैं.तो नदी का वेग और जलस्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है जिससे निचली बस्तियों और घाटों को भारी नुकसान पहुँचता है।

कई वर्ष पहले गंगा का बहाव ऐसा नहीं था. अब हर साल घाटों को नुकसान होता है.संबंधित विभाग जहां गंगोत्री धाम के घाटों की सुरक्षा मे सुरक्षा दीवार लगा रहा है क्या घाट और मंदिर की सुरक्षा दीवारें इस वेग को झेल पाएगी या नहीं? सरकार को यहाँ पर ठोस सुरक्षा कार्यों की जरूरत है.चुनौती केवल निर्माण की नहीं है, बल्कि संतुलन की है. क्योंकि यह एक इको-सेंसिटिव जोन है.यहाँ कंक्रीट का भारी निर्माण भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है। जरूरत है ‘बायो-इंजीनियरिंग’ और प्रकृति के अनुकूल सुरक्षा घेरों की.ताकि आस्था के इन केंद्रों को बचाया जा सके।

गंगोत्री धाम के सचिव सुरेश सेमवाल ने कहा गंगोत्री के घाट केवल पत्थर के ढांचे नहीं है बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का आधार हैं.अगर हम आज नहीं जागे, तो बढ़ता जलस्तर कल हमारी इस विरासत को इतिहास बना सकता है. माँ गंगा को बचाने के लिए हमें हिमालय को बचाना होगा. साथ ही उन्होंने कहा गंगोत्री धाम मे गंगा नदी के बीचों बीच एकत्र हुए RBM को जल्द से जल्द हटाना चाहिए. जिससे गंगा की धारा बिना वेग के निरंतर बहती रहे, जिससे घाट व मंदिर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। गंगा नदी के वेग का।
