अरण्य उवाच: जंगल बचेंगे, तभी बचेगा मानव अस्तित्व
अरण्य उवाच…
जंगल के बीचोंबीच गुजरते हुए,
देवदार के विराट दरख़्तों के साये में,
कभी मन करता है…
रात के गहन अंधकार में
अकेला चला जाऊँ
जंगल के भीतर,
सम्पूर्ण मोह-माया त्यागकर,
किसी निर्जन कोने में
खुद को प्रकृति के हवाले कर दूँ।
फिर चुपचाप बैठकर सुनूँ…
जंगल की गहनता,
जंगल की वेदना,
अरण्य का मौन संवाद,
अरण्यास्पंदन…
तिमिर में विचरते निशाचर जीव,
पत्तों की रहस्यमयी सरसराहट,
दूर कहीं खगों का कलरव,
कहीं किसी वन्यजीव की आहट,
और उस अनंत निस्तब्धता में
जीवंत होता जंगल का अद्भुत संसार!
जहाँ मौन भी बोलता है,
अंधकार भी संवाद करता है,
हर वृक्ष की अपनी कहानी है,
हर पगडंडी में सदियों की रवानी है।
इसी अलौकिक संसार के बीच
खड़ा है एक इतिहास…
ब्याँली बंगला!
देवदार के सघन वन से घिरा,
आजादी के दौर का साक्षी,
इतिहास की स्मृतियों को समेटे,
एक खूबसूरत, भव्य और ऐतिहासिक आशियाना।
यहाँ आकर लगता है,
मानो समय ठहर गया हो,
प्रकृति ने अपनी बाँहों में
इतिहास को समेट लिया हो।
और तभी…
अंतर्मन के किसी गहरे कोने से
एक आवाज आती है,
कोई आदेश पारित होता है
बिना किसी हस्ताक्षर के,
बिना किसी औपचारिकता के…
“इन जंगलों को बचाना है
केवल वृक्षों को बचाना नहीं है,
यह वन्यजीवों का संसार बचाना है,
प्रकृति की संवेदनाएँ बचानी है,
मानवता का भविष्य बचाना है,
और अंततः…
इंसान के अपने अस्तित्व को बचाना है!”
कुछ क्षण ठहरकर
उस मौन आदेश को सुना,
आत्मा की गहराइयों में उतारा
और फिर…
आदेश नोट किया!
साधु लाल पलियाल
उप प्रभागीय वनाधिकारी
बड़कोट


