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उत्तरकाशी के वीरपुर में लोसर पर्व: किन्नौरी जाड़-भोटिया खाम्पा समुदाय की अनोखी सांस्कृतिक पहचान

उत्तरकाशी के वीरपुर में लोसर पर्व: किन्नौरी जाड़-भोटिया खाम्पा समुदाय की अनोखी सांस्कृतिक पहचान 

 

उत्तरकाशी- उत्तरकाशी जिले के डुंडा ब्लॉक में स्थित वीरपुर कस्बा/गांव किन्नौरी जाड़-भोटिया खाम्पा समुदाय का प्रमुख निवास स्थान है। यहां लोसर (Losar) त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है, जो बौद्ध परंपरा के अनुसार नए साल कोन्नोरी तिब्बती/भोटिया नववर्ष का स्वागत करते है। यह पर्व हिंदू और बौद्ध परंपराओं का सुंदर मिश्रण है, जिसमें दीपावली, होली और नववर्ष एक साथ मनाए जाते हैं।लोसर त्योहार की मुख्य विशेषताएं वीरपुर में:यह त्योहार सामान्यतः फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) में मनाया जाता है और 3 से 4 दिनों (कभी-कभी 15 दिनों तक) तक चलता है।

 

पहले दिन दीपावली की तरह घरों में दीए जलाए जाते हैं, मशालें जलाकर उत्सव शुरू होता है। बीच के दिनों में पूजा-अर्चना, पारंपरिक नृत्य (जैसे रासो-तांदी), लोक गीत और रिंगाली देवी मंदिर में विशेष पूजा होती है।

 

महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा किन्नौरी, भोटिया व् खाम्पा परिधानमें सजकर नाचती-गाती हैं। आटे की होली त्योहार का सबसे अनोखा और आकर्षक हिस्सा है, जो आमतौर पर अंतिम दिन (तीसरे या चौथे दिन) खेली जाती है।

आटे की होली का उल्लेख और महत्व वीरपुर में रिंगाली देवी मंदिर के आसपास या गांव में सभी लोग (लगभग 300 से अधिक भोटिया परिवार) एकत्र होते हैं। एक-दूसरे पर गेहूं/जौ का आटा डालकर होली खेलते हैं. यह रंगों की जगह आटे से खेली जाती है, जो इस क्षेत्र की ठंडी जलवायु और कृषि-आधारित जीवनशैली से जुड़ा है। यह होली भाईचारे, एकता, खुशी और समृद्धि का प्रतीक है। लोग हंसते-खेलते एक-दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते हैं।
होली के बाद मंदिर में पूजा, झंडे बदलना और सामूहिक नृत्य होता है।

यह परंपरा उत्तरकाशी के अन्य कोन्नोरी,भोटिया व् खाम्पा क्षेत्रों (जैसे हर्षिल, डुंडा, बगोरी) में भी देखी जाती है, लेकिन वीरपुर में यह बहुत प्रसिद्ध है। यह त्योहार किन्नौरी, जाड़-भोटिया व् खाम्पा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है, जहां प्रकृति, पूर्वजों की पूजा और सामुदायिक एकजुटता प्रमुख हैं। हर साल फरवरी-मार्च में यहां का माहौल उत्सव से भर जाता है ।

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