उत्तराखंडपौड़ी गढ़वाल

भारतीय ज्ञान परम्परा को प्रत्येक विषय से जोड़ना समय की आवश्यकता: डॉ. अमरजीत परिहार

भारतीय ज्ञान परम्परा को प्रत्येक विषय से जोड़ना समय की आवश्यकता: डॉ. अमरजीत परिहार

 

श्रीनगर- गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कार्यक्रम समन्वयक डॉ. अमरजीत परिहार ने अपने विस्तृत संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि सभी शैक्षणिक विषयों के साथ समन्वित रूप में समझने की आवश्यकता है। डॉ० परिहार ने जोर दिया कि भारतीय ज्ञान परम्परा अनुभव, अवलोकन और प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित है, इसलिए इसे शिक्षा की मुख्यधारा में लाना समय की मांग है।

कार्यक्रम में वक्ताओं का स्वागत करते हुए एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो० डी० एस० नेगी ने कहा कि विश्वविद्यालय में संचालित प्रत्येक विषय से संबंधित भारतीय ज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
द्वितीय सत्र के व्याख्याता प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता प्रो० मोहन पंवार ने वेदों में निहित भौगोलिक ज्ञान का उल्लेख करते हुए कहा कि ऋग्वेद में नदियों और पर्वतों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जबकि पृथ्वी सूक्त में जलवायु, वातावरण, ग्रहण और भूकम्प जैसी प्राकृतिक घटनाओं का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि संहिताकाल और उपनिषद काल में भी भूगोल संबंधी चिंतन विकसित रूप में उपस्थित था। भारतीय ज्ञान परम्परा को विश्व की प्राचीनतम ज्ञान प्रणालियों में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र में अद्भुत ज्ञान परम्परा समाहित है, जिसकी आधुनिक संदर्भ में विशेष प्रासंगिकता है।
इस अवसर पर राजकीय पीजी कॉलेज हरिपुर, हिमाचल के डॉ० दिनेश कुमार शर्मा ने कृषि आधारित भारतीय ज्ञान परम्परा पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन-पद्धति का आधार रही है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ० विकास चौबे एवं शोधार्थी अपराजिता घिल्डियाल ने संयुक्त रूप से किया।

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