बर्फ की सफेद चादर में लिपटी हर्षिल घाटी: खेती के लिए ‘वरदान’ बनी बर्फबारी
बर्फ की सफेद चादर में लिपटी हर्षिल घाटी: खेती के लिए ‘वरदान’ बनी बर्फबारी
उत्तरकाशी. मार्च 2026 का महीना चल रहा है और उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री धाम, टकनौर क्षेत्र सहित हर्षिल और बगोरी गांव में जोरदार बर्फबारी देखने को मिली। जिसमे दिसंबर जैसी ठंड का एहसास हो रहा है.लेकिन ये बर्फ सिर्फ सौंदर्य नहीं, बल्कि प्रकृति का वरदान भी है।
गंगोत्री ग्लेशियर (गौमुख) गंगा नदी का मूल स्रोत है। मार्च में बर्फबारी सबसे खास होती है क्योंकि ये वसंत की शुरुआत है। नई बर्फ की मोटी परत ग्लेशियर पर जमा हो जाती है। इससे ग्लेशियर का मास बैलेंस (वजन) बढ़ता है। ताजा बर्फ सूरज की किरणों को रिफ्लेक्ट करती है (उच्च अल्बेडो प्रभाव), जिससे नीचे की बर्फ और बर्फीली चट्टानें कम पिघलती हैं।
नतीजा ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघलते हैं.गर्मियों में नदियों में पानी का स्थिर बहाव बना रहता है।कहा जाता हैं कि स्वस्थ बर्फबारी से हिमालयी ग्लेशियरों की रक्षा होती है और जल संकट कम होता है। बिना बर्फ के सर्दियां सूखी पड़ रही थीं.लेकिन इस मार्च की बर्फबारी ने ग्लेशियरों को नया जीवन दे दिया हैं.
इस बर्फवारी से दूसरा बड़ा फायदा खेती और किसानों के लिए भी हैं.टकनौर घाटी तो सेबों का गढ़ है. बगोरी और आसपास के गांवों में सब्जी, आलू, गेहूं और रबी फसलें उगाई जाती हैं। इस बर्फबारी से खेती को कई फायदे होते हैं. मिट्टी को नमी मिलती हैं.बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है. मिट्टी को गहराई तक नम रखती है.सूखे की मार से बचाव होता हैं.
सेब के बागानों के लिए जरूरी हैं ठंडक. सेब के पेड़ों को सर्दी और बर्फ की जरूरत होती है। कहा जाता हैं कि मार्च की बर्फ चिलिंग आवर्स पूरा करती है.फूल अच्छे लगते हैं और फल बड़े-मीठे आते हैं.
रबी फसलों को इस बर्फवारी से फायदा मिलता हैं. गेहूं, आलू, जौ जैसी फसलों को मिट्टी की नमी मिल जाती है.सिंचाई का पानी बचता है.इस बर्फवारी से भूजल और नदियों का नया रिचार्ज मिलता हैं. गंगोत्री से निकलने वाली नदियां और झरने फिर से भर जाएंगे. पूरे गढ़वाल क्षेत्र की खेती को पानी मिलता रहेगा ।
