रक्षाबंधन पर मुखवा की महिलाओं की अनूठी पहल: भोजपत्र, पदम की लकड़ी,देवीदार और ब्रह्मकमल से बनाई इको-फ्रेंडली राखियाँ
रक्षाबंधन पर मुखवा की महिलाओं की अनूठी पहल: भोजपत्र, पदम की लकड़ी,देवीदार और ब्रह्मकमल से बनाई इको-फ्रेंडली राखियाँ
उत्तरकाशी- रक्षाबंधन के पावन पर्व के अवसर पर माँ गंगा के शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा गाँव की स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने एक अनूठी और पर्यावरण-अनुकूल पहल की है। महिलाओं ने पारंपरिक हस्तकला और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कर अत्यंत सुंदर एवं पवित्र राखियाँ तैयार की हैं।
इन राखियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले भोजपत्र, ब्रह्मकमल, पदम (पद्म) की लकड़ी, केदारपाती और देवदार की पत्तियों जैसी प्राकृतिक और औषधीय/पवित्र सामग्रियों का उपयोग किया गया है। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है, बल्कि हिमालयी संस्कृति और परंपराओं को भी दर्शाती है।
मुखवा गाँव के निवासी एवं गंगा पुरोहित सुधांशु सेमवाल ने स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सुधांशु सेमवाल ने कहा.हमारे मुखवा गाँव के स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने रक्षाबंधन के लिए अपने हाथों से बेहद सुंदर राखियाँ बनाई हैं। इन राखियों में भोजपत्र, उच्च हिमालय से ब्रह्मकमल, पदम की लकड़ी, केदारपाती और देवदार की पत्तियों का उपयोग किया गया है। मैं गाँव की इन महिलाओं को इस उत्कृष्ट कार्य के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
इसके साथ ही उन्होंने सरकार एवं स्थानीय प्रशासन से इन महिलाओं की कला को वृहद स्तर पर मंच प्रदान करने की अपील की। उन्होंने कहा
मैं शासन-प्रशासन और सरकार से विनम्र निवेदन करता हूँ कि ग्राम मुखवा की इन मेहनती महिलाओं को प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सहयोग व साधन उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि वे स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बन सकें।
स्थानीय उत्पाद और महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल
बाजार में मिलने वाली प्लास्टिक और चाइनीज राखियों के मुकाबले, मुखवा की महिलाओं द्वारा बनाई गई ये राखियाँ अध्यात्म, संस्कृति और पर्यावरण का अनूठा संगम हैं। स्थानीय लोगों एवं श्रद्धालुओं द्वारा इन राखियों की काफी सराहना की जा रही है।
स्वयं सहायता समूह की इस पहल से न केवल स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार व स्वरोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं, बल्कि प्रधानमंत्री के वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भर भारत के सपने को भी ग्रामीण धरातल पर पंख लग रहे हैं।
