देहरादून में ‘बुग्याल दिवस-2026’ का आयोजन: उत्तरकाशी के शिक्षाविद्द शम्भू प्रसाद नौटियाल मैती सम्मान से अलंकृत
देहरादून में ‘बुग्याल दिवस-2026’ का आयोजन: उत्तरकाशी के शिक्षाविद्द शम्भू प्रसाद नौटियाल मैती सम्मान से अलंकृत
उत्तरकाशी
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों यानी अल्पाइन घास के मैदानों के संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने तथा इस दिशा में कार्य करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बुधवार को देहरादून स्थित संस्कृति विभाग सभागार में ‘बुग्याल दिवस-2026’ समारोह आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम 2 से 9 सितम्बर तक आयोजित हो रहे ‘हिमालय सप्ताह समारोह’ के अंतर्गत मैती संस्था द्वारा आयोजित किया गया।
इस अवसर पर आयोजित एक दिवसीय सेमिनार में वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक ज्ञान और जनभागीदारी के समन्वय पर जोर दिया।
समारोह में पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित किया गया। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन, गंगा और हिमालयी पारिस्थितिकी के प्रति जन-जागरूकता तथा रचनात्मक एवं अभिनव प्रयोगों के लिए शम्भू प्रसाद नौटियाल को प्रतिष्ठित ‘मैती सम्मान-2026’ से अलंकृत किया गया। उन्हें प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। नौटियाल लंबे समय से युवाओं एवं विद्यार्थियों को पर्यावरण, गंगा और जल संरक्षण से जोड़ने के साथ ही हिमालयी तालों एवं बुग्यालों में जैव-विविधता अध्ययन, प्रकृति आधारित शोध एवं संरक्षण संबंधी गतिविधियां संचालित करते आ रहे हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वन एवं स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल रहे। उन्होंने बुग्यालों को उत्तराखंड की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर बताते हुए इनके संरक्षण के लिए किए जा रहे सरकारी प्रयासों की जानकारी दी। विशिष्ट अतिथि पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, संस्थापक हेस्को, ने हिमालयी पर्यावरण संरक्षण में समुदाय आधारित प्रयासों को मजबूत करने पर बल दिया।
मैती संस्था के संस्थापक पद्मश्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बुग्याल संरक्षण के प्रति संस्था की प्रतिबद्धता दोहराई। सेमिनार में यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत और प्रमुख मुख्य वन संरक्षक सुशांत कुमार पटनायक सहित अनेक वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि बुग्याल केवल प्राकृतिक घास के मैदान नहीं, बल्कि हिमालयी जैव-विविधता, जल सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय पशुपालक संस्कृति के महत्वपूर्ण आधार हैं। इनका संरक्षण सरकार, वैज्ञानिक समुदाय, स्थानीय समुदाय और समाज सभी का साझा दायित्व है।
