गंगोत्री की राजनीति: उत्सवों की चमक में कहाँ खो गए विकास और सुरक्षा के मूलभूत सवाल?
उत्तरकाशी
उत्तराखंड की गंगोत्री विधानसभा सीट हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील और चर्चाओं में रही है। जैसे-जैसे चुनावी बिगुल की सुगबुगाहट तेज होती है, क्षेत्र का सियासी पारा भी चढ़ने लगता है। लेकिन इस बार सबसे बड़ा सवाल किसी पार्टी या चेहरे का नहीं, बल्कि गंगोत्री की राजनीति के उस स्थापित फॉर्मूले का है जो वर्षों से बिना किसी बदलाव के चला आ रहा है।
नेताओं की एक जैसी स्क्रिप्ट और मतदाता की उदासीन सहभागिता
गंगोत्री विधानसभा में दावेदारों की शैली में एक अजीब-सी एकरूपता देखने को मिलती है।कथाएं हों, ध्याणी मिलन (बेटी-ध्याणियों के कार्यक्रम), स्थानीय मेले हों या फिर शादी-ब्याह हर राजनीतिक दल का प्रत्याशी एक ही ढर्रे पर चलता नज़र आ रहा है।
गंगोत्री की जनता भी इस व्यवस्था को बखूबी निभा भी रही है। दो दिन के आयोजनों में आधा दर्जन नेताओं को पहले दिन और बाकी को दूसरे दिन आमंत्रित कर दिया जाता है। वही भव्य स्वागत, वही रासौं नृत्य में नेताओं का आगे-आगे थिरकना, नामकरण की मिठाइयां खाना और अंतिम संस्कार में उपस्थिति दर्ज कराना।
नतीजा यह हुआ है कि जनता को भी ऐसे ही नेताओं की आदत पड़ गई है जो उनके सामाजिक समारोहों में नज़र आएं, भले ही पांच साल बाद वे बुनियादी सुविधाओं के नाम पर ठगा हुआ महसूस करें।
क्या यही है जनप्रतिनिधि का काम?
किसी भी विधायक का प्राथमिक कर्तव्य क्षेत्र के लिए नीतिगत योजनाएं बनाना, कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों की निगरानी करना तथा दूरदराज के क्षेत्रों तक मूलभूत ढांचा पहुंचाना होता है। लेकिन गंगोत्री में स्थिति यह है कि विधायक कोई भी रहा हो, उसने जनता की इस सामाजिक नस को भली-भांति पहचान लिया है। जब तक नेता मेलों और शादीयों में हाजिरी लगाते रहेंगे , तब तक उससे कड़े सवाल नहीं पूछे जाएंगे।
बुनियादी सवाल, जो आज भी अनुत्तरित
उत्सव धर्मिता के इस शोर में गंगोत्री विधानसभा के वे ज्वलंत मुद्दे दब जाते हैं जो ग्रामीणों के दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं,
स्वास्थ्य और शिक्षा- जिला मुख्यालय को छोड़ दें तो दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा व्यवस्था का बुरा हाल है।साथ ही जिलामुख्यालय का अस्पताल को अब जनता रेफर सेटंर तक कह रही है.
सड़क और आपदा – भूधंसाव से प्रभावित गांवों की सुरक्षा, आपदा से बेहाल ग्रामीणों के पुनर्वास और जर्जर सड़कों के सुधार पर कोई ठोस कार्ययोजना जनता के सामने नहीं रखी जाती।
कार्यों की सुस्त रफ्तार – दावे किए जाते हैं कि काम प्रगति पर है, लेकिन सच्चाई यह है कि मुख्यालय स्तर पर ही काम पूरे नहीं हो पा रहे हैं, तो दूरदराज के सीमांत गांवों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
अंदरखाने की सियासत और ‘वफादारी’ का खेल
चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही कार्यकर्ताओं का अपने-अपने नेताओं के प्रति वफादारी का प्रदर्शन चरम पर है। लेकिन चुनावी राजनीति में वफादारियों का गणित समय बदलते ही बदल जाता है। अंदरखाने क्या पक रहा है और वक्त आने पर क्या ‘खेला’ हो सकता है, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल तो नहीं है मगर फिलहाल भी नहीं कठिन है।
ज़ब तक मतदाता नेताओं से सीधे और तीखे सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक स्थिति में बदलाव संभव नहीं है। जनता को अब यह कहने का साहस दिखाना होगा.यह बताइए कि गंगोत्री के गांवों, स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए आपके पास क्या विज़न है?
