1962 में खाली हुआ सीमांत जादुँग गांव फिर से होगा आबाद, पुनर्वास प्रक्रिया अंतिम चरण में

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1962 में खाली हुआ सीमांत जादुँग गांव फिर से होगा आबाद, पुनर्वास प्रक्रिया अंतिम चरण में

उत्तरकाशी-

 

भारत-चीन युद्ध के दौरान वर्ष 1962 में खाली कराए गए सीमांत जादुँग गांव को पुनर्जीवित करने और आबाद करने की दिशा में कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत सरकार और उत्तराखंड सरकार की योजना के तहत गांव के पुनर्वास और पर्यटन विकास के प्रथम चरण का कार्य अंतिम चरण में है।

​प्रशासनिक टीम के साथ गांव का निरीक्षण करने पहुंचे स्थानीय नागरिक खुशाल सिंह राणा ने बताया कि प्रथम चरण के अंतर्गत निर्मित कराए जा रहे 6 घर लगभग बनकर तैयार हो चुके हैं। आगामी 25 तारीख तक इन घरों को ग्रामीणों को हैंडओवर (सौंपने) की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।​वर्षों बाद अपने पैतृक गांव के पुनरुद्धार और पुनर्वास की इस पहल से ग्रामीणों में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है। ग्रामवासियों ने इस ऐतिहासिक कार्य के लिए राज्य और केंद्र सरकार का आभार व्यक्त किया है।

अपने पैतृक गांव जादुंग पहुंचे स्थानीय निवासी ने बताया कि गांव में पर्यटकों के ठहरने के लिए पर्यटन विभाग और गढ़वाल मंडल विकास निगम (GMVN) के सहयोग से होमस्टे का निर्माण कराया जा रहा है।

*स्थानीय निवासी से ​मिली जानकारी के अनुसार
​होमस्टे की स्थिति*

गांव में ६ होमस्टे पूरी तरह बनकर तैयार हो चुके हैं। इसके अलावा ८ अन्य होमस्टे की नींव रखी जा चुकी है, जबकि शेष होमस्टे का निर्माण अगले चरण में किया जाएगा।


​ग्रामीणों की मुख्य प्रमुख मांगे.

​गांव के बुजुर्ग एवं स्थानीय निवासियों ने सरकार से अपील की है कि नेलांग, जादुंग और जनकताल तक पर्यटकों की आवाजाही को आसान बनाने के लिए इनर लाइन परमिट के नियमों में ढील दी जाए या इसे पर्यटकों के लिए खोला जाए।

​स्थानीय निवासी का कहना है
​यदि पर्यटकों के लिए इनर लाइन परमिट की प्रक्रिया सरल होगी, तो अधिक संख्या में पर्यटक यहाँ आएंगे और होमस्टे में ठहरेंगे। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यहाँ के स्थानीय निवासियों को रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होंगे।

​इस दौरान ग्राम पर्यटन समिति जादुँग के अध्यक्ष गुमान सिंह नेगी, उपाध्यक्ष जीतपाल रावत, कोषाध्यक्ष भवान सिंह राणा, दीवान नेगी, महेन्द्र राणा, खुशाल राणा, गोवर्धन राणा सहित कई अन्य ग्रामीण उपस्थित रहे।

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