उत्तरकाशीउत्तराखंड

जब गंगा खुद करती है उपचार: बैक्टीरियोफेज, विज्ञान और जनभागीदारी से सुरक्षित होता भविष्य-विज्ञान संचारक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल

 

जब गंगा खुद करती है उपचार: बैक्टीरियोफेज, विज्ञान और जनभागीदारी से सुरक्षित होता भविष्य-विज्ञान संचारक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल

 

धनोल्टी एक्सप्रेस न्यूज

उत्तरकाशी(वीरेंद्र सिंह नेगी): विज्ञान संचारक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल कहते हैं गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसकी धड़कनों में जीवन, संस्कृति और विज्ञान कि धारा एक साथ प्रवाहित होते हैं। हिमालय से निकलकर मैदानों तक बहने वाली यह नदी अनगिनत जीवों का घर है.गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल, कछुए, सैकड़ों मछलियाँ और हजारों पक्षी प्रजातियाँ इसके जीवन तंत्र का हिस्सा हैं।

 

आज गंगा की जैव विविधता एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ चुनौतियाँ और संभावनाएँ साथ-साथ मौजूद हैं। प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते मानवीय दबाव ने नदी के संतुलन को प्रभावित किया है. लेकिन इसी बीच विज्ञान और समाज मिलकर एक नई उम्मीद भी जगा रहे हैं।

 

गंगा के जल का एक अनोखा वैज्ञानिक पहलू है.बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage)। ये सूक्ष्म वायरस हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं. जिससे जल की स्वाभाविक शुद्धता बनी रहती है। वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा की आत्मशुद्धि क्षमता के पीछे इन सूक्ष्म जीवों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.जो इसे अन्य नदियों से अलग बनाती है।

 

इस बीच गंगा संरक्षण में समुदाय की भागीदारी एक नई ताकत के रूप में उभरी है.नदी किनारे सफाई अभियान, पौधारोपण, प्लास्टिक मुक्त पहल और जैव विविधता के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों में स्थानीय लोगों की सक्रिय भूमिका दिखाई दे रही है.ग्रामीण समुदाय, युवा और स्वयंसेवी संगठन मिलकर गंगा को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

 

भविष्य की गंगा की कल्पना अब केवल एक सपना नहीं रही. नई तकनीकों के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान का समावेश इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है.यदि समाज और विज्ञान मिलकर कार्य करें. तो गंगा एक बार फिर अपनी स्वाभाविक शक्ति और समृद्ध जैव विविधता को प्राप्त कर सकती है।

 

विज्ञान संचारक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल का कहना हैं.

गंगा (भागीरथी नदी )का भविष्य केवल योजनाओं पर नहीं,बल्कि समाज की जागरूकता और विज्ञान की समझ पर निर्भर करता है। बैक्टीरियोफेज जैसे सूक्ष्म तंत्र हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति स्वयं में समाधान छिपाए हुए है.जरूरत है उसे समझने और संरक्षित करने की।

 

स्पष्ट है कि गंगा की रक्षा केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ विषय है। यदि आज हम सजग होकर सामूहिक प्रयास करें, तो गंगा की धारा हमेशा की तरह जीवनदायिनी बनी रहेगी।

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