वीर सिंह रौतेला: उत्तरकाशी के अदम्य साहस और न्याय के प्रतीक
वीर सिंह रौतेला: उत्तरकाशी के अदम्य साहस और न्याय के प्रतीक


यह सत्य कहानी जो 19वीं शताब्दी के लगभग 1840 के दशक की है.वीर सिंह रौतेला झाला गांव (उत्तरकाशी) के निवासी थे। वे एक साधारण लेकिन वीर स्वभाव के योद्धा थे, जिन्होंने अपने साथियों (निर्दोष चरवाहों) की हत्या का बदला लेने के लिए माणा गांव पर तीन बार हमला किया और वहां उत्पात मचाया। यह घटना उनकी अदम्य साहस और न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन गई।
आज हम सुनते हैं उत्तरकाशी के झाला गांव की एक ऐसी सत्य कहानी जो हर्षिल घाटी की पहचान है। यह सत्य कहानी है भड़ वीर सिंह रौतेला की. एक ऐसे योद्धा की, जिसने निर्दोष चरवाहों की हत्या देखकर अपना खून खौला दिया और माणा गांव के अत्याचारियों को तीन बार सबक सिखाया।
समय था 1840 का दशक
गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में चरवाहे भेड़-बकरियां चराते हुए दूर-दूर तक जाते थे। झाला गांव के वीर सिंह रौतेला भी ऐसे ही एक साहसी युवा थे। उनके कुछ साथी (दोस्त चरवाहे) माणा गांव के इलाके में चराने गए। वहां के कुछ ग्रामीणों ने निर्दोष चरवाहों पर हमला कर दिया और उनकी हत्या कर दी। यह सुनकर वीर सिंह रौतेला का खून खौल उठा। वे बोले अगर पहाड़ की मिट्टी में न्याय नहीं मिलेगा, तो हम खुद न्याय लेंगे. वीर सिंह ने अपनी टीम बनाई और माणा गांव पर पहला हमला किया। उन्होंने वहां उत्पात मचाया, अत्याचारियों को सबक सिखाया। लेकिन एक बार में काम नहीं चला। उन्होंने दोबारा हमला किया और फिर तीसरी बार। तीनों बार में उन्होंने अपने दोस्तों की मौत का पूरा बदला लिया। यह उनकी शौर्य गाथा का केंद्र है. न कि किसी बड़े युद्ध में, बल्कि अपने लोगों की रक्षा और न्याय के लिए उठे साधारण पहाड़ी योद्धा की कहानी। लोक गीतों में उन्हें ‘भड़ वीर’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने भेड़ चराने वालों (भड़) की रक्षा के लिए खुद भड़ (योद्धा) बन गए। वीर सिंह रौतेला की यह गाथा आज भी झाला गांव के बुजुर्गों के मुंह से निकलती है। रेशमा शाह, सुंदर नरवान जैसे लोक गायकों ने उनके नाम पर गीत गाए हैं वीर सिंह रौतेला।
क्या गीतों तक सिमट गए वीर सिंह रौतेला ?
इन गीतों में उनकी वीरता, साहस और न्यायप्रियता का वर्णन है।वीर सिंह रौतेला की सबसे बड़ी विरासत उनके झाला गांव में स्थित नौ खम्भा भवन (वीर सिंह भवन / पंचपुरा भवन) है। यह कोटि बनाल शैली का 5 मंजिला पारंपरिक लकड़ी का भवन है. भूकंप रोधी, इको-फ्रेंडली और सैकड़ों साल पुराना (कुछ अनुमानों के अनुसार 300 वर्ष से भी अधिक)। यह भवन पहाड़ी वास्तुकला की मिसाल है, जो आज भी वैज्ञानिकों को चुनौती देता है। लेकिन दुख की बात आज यह भवन जीर्ण-शीर्ण हालत में है। दीवारें टूट रही हैं, छत जर्जर है। लोक गीतों की शूटिंग के दौरान भी गांव वाले यही दर्द बयां करते हैं कि संस्कृति विभाग या पर्यटन विभाग क्यों नहीं इसकी सुध लेता?उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र (सेलकू मेला) में आज भी उनकी थाती (स्मृति) में भगवान समेश्वर महाराज का आशीर्वाद लिया जाता है। लेकिन राज्य स्तर पर कोई संज्ञान नहीं।गंगोत्री धाम जाते समय अगर आप झाला गांव रुकें, तो यह भवन और उनकी गाथा देख-सुन सकते हैं।

शौर्य और वास्तुकला का संगम: वीर सिंह रौतेला के ‘नौ-खम्भा’ भवन को बचाने की जंग
वीर सिंह रौतेला भवन जिसे पंचपुरा भवन भी कहा जाता है। यह भी कहा जाता हैं ये पंचपुरा भवन वीर सिंह रौतेला के पूर्वज चंद्र रौतेला (खंपाट )ने बनाया था. जिसे इस भवन को वीर सिंह रौतेला की बहादुरी के नाम पर पंचपुरा भवन रखा गया। अभी के समय इस भवन की स्थिति काफी दयनीय है। स्थानीय लोगो ने उपजिलाधिकारी को पत्र के माध्यम से अवगत कराया की इस भवन की स्थति को सही किया जाय. इसे राज्य धरोहर की और लाया जाय, जिससे इस भवन को सुरक्षा मिलेगी और पर्यटक भी वीर सिंह रौतेला के बारे में अधिक जानकारी भी प्राप्त कर पाएंगे.हालांकि प्रशासन द्वारा वीर सिंह के वंशज से NOC मांगी जाने की बात कहीं जा रही है।
झाला पंचायत और वंशजों ने उठाई ‘वीर भवन’ को राज्य धरोहर बनाने की मांग
झाला गाँव की पंचायत ने भी इस भवन को राज्य धरोहर घोषित करने की मांग की हैं. वीर सिंह के वंशज भी इस मांग से सहमत भी हैं जिसमे रुकुम सिंह रौतेला, नोनियाल रौतेला, दीपक रौतेला, जगदम्बा रौतेला, सुमिला रौतेला, भरत सिंह रौतेला, ग्राम प्रधान अभिषेक रौतेला प्रशासन को NOC देने को सहमत हुए।

क्या सिखाते हैं वीर सिंह रौतेला
‘पहाड़ का वीर कभी चुप नहीं रहता। न्याय के लिए वह अकेला भी खड़ा हो जाता है। आज जब पर्यटन विभाग उत्तरकाशी के वीरों की धरोहर को बढ़ावा देने का दावा करता है, तो झाला के इस वीर भवन और गाथा को क्यों भुला दिया गया? देवभूमि के वीरों की यह थाती बचानी अति आवश्यक हैं। ऐसे और भी भवन हैं जिनकी स्थिति सही नहीं हैं. प्रशासन को इन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता हैं। वरना आने वाली पीढ़ी सिर्फ गीतों में ही सुन पाएगी। जमीन पर कुछ नहीं दिख पायेगा।
