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आवारा पशुओं पर 11 माह से सरकारी खेल! पशुपालन विभाग ने जिला पंचायत को लौटाई जिम्मेदारी, अब सवाल—कार्रवाई कब?

 

आवारा पशुओं पर 11 माह से सरकारी खेल! पशुपालन विभाग ने जिला पंचायत को लौटाई जिम्मेदारी, अब सवाल—कार्रवाई कब?

सरकारी पत्र ने ही खोल दी जिम्मेदारी की पोल, हाईकोर्ट के आदेश का भी हवाला; जिला पंचायत और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर उठे सवाल

नैनबाग (शिवांश कुंवर)- क्षेत्र में आवारा पशुओं की समस्या को लेकर शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 8 अक्टूबर 2025 को सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत संख्या CMHL-102025-6-859723 को लेकर मुख्य पशुचिकित्साधिकारी, टिहरी गढ़वाल-नरेन्द्रनगर के कार्यालय ने 13 अक्टूबर 2025 को अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत टिहरी गढ़वाल को पत्र भेजकर जिम्मेदारी स्पष्ट कर दी थी। आज सितंबर 2026 आ चुका है और शिकायत को दर्ज हुए करीब 11 माह बीत चुके हैं, लेकिन समस्या के समाधान को लेकर स्थिति सवालों के घेरे में है।

किसने किसे भेजी शिकायत और फिर किसने लौटाई?

दस्तावेज के अनुसार, जिला पंचायत कार्यालय द्वारा 8 अक्टूबर 2025 को उक्त शिकायत पशुपालन विभाग को हस्तांतरित की गई थी। इसके बाद मुख्य पशुचिकित्साधिकारी कार्यालय ने 13 अक्टूबर 2025 को पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि ग्रामीण क्षेत्र में विचरण कर रहे आवारा पशुओं के प्रबंधन से संबंधित जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की है।
पत्र में उत्तराखंड हाईकोर्ट के 27 अक्टूबर 2016 के Criminal Misc. Application No. 1526/2016 (Pooja Bahukhandi vs State of Uttarakhand and others) के आदेश का हवाला दिया गया है। साथ ही मुख्य सचिव उत्तराखंड शासन के 11 नवंबर 2016 के शासनादेश संख्या 1930/गृह अनुभाग-3 का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं के प्रबंधन की व्यवस्था स्थानीय निकायों के स्तर से सुनिश्चित की जानी है।
यानी पशुपालन विभाग ने नियम और आदेश का हवाला देते हुए गेंद फिर जिला पंचायत के पाले में डाल दी।

जिम्मेदारी साफ, फिर 11 महीने से कार्रवाई क्यों नहीं?
पत्र में साफ लिखा है कि शिकायत ग्रामीण क्षेत्र में विचरण कर रहे आवारा पशुओं के प्रबंधन से संबंधित होने के कारण इसे जिला पंचायत, टिहरी गढ़वाल को हस्तांतरित किया जा रहा है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब विभागीय पत्र में जिम्मेदारी स्पष्ट कर दी गई थी, तो करीब 11 माह बाद भी आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं हो पाया? क्या सरकारी पत्राचार ही कार्रवाई का अंतिम पड़ाव बनकर रह गया है?

जनप्रतिनिधियों से भी जनता का सीधा सवाल

ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के स्तर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका और जवाबदेही भी सवालों के घेरे में है। जनता की रोजमर्रा की समस्याओं को उठाना और उनका समाधान कराना जनप्रतिनिधियों की प्राथमिक जिम्मेदारियों में होना चाहिए। यदि आवारा पशुओं की समस्या लगातार बनी हुई है तो जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत स्तर पर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए?
जनता यह भी जानना चाहती है कि 11 माह पुरानी सीएम हेल्पलाइन शिकायत पर अब तक कितनी कार्रवाई हुई, कहां पशुओं के प्रबंधन की व्यवस्था की गई और समस्या के स्थायी समाधान के लिए क्या योजना बनाई गई?
प्रतिलिपि में भी सब कुछ दर्ज—फिर जवाबदेही किसकी?

अब सवाल सिर्फ आवारा पशुओं का नहीं, बल्कि सरकारी जिम्मेदारी और जवाबदेही का है। जब संबंधित विभाग ने हाईकोर्ट के आदेश और शासनादेश का हवाला देते हुए जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की बताकर शिकायत जिला पंचायत को हस्तांतरित कर दी, तो फिर जिला पंचायत और संबंधित स्थानीय निकायों की ओर से धरातल पर कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं दे रही?
करीब 11 महीने से शिकायत, विभागों के बीच पत्राचार और जिम्मेदारी तय होने के बावजूद समस्या बरकरार—आखिर जनता कब तक भुगतेगी और जिम्मेदार कब जागेंगे?

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